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खस्ता हाल इकोनॉमी:श्रीलंका में कागज-स्याही खत्म, खरीदी के लिए सरकार के पास फंड्स नहीं; लाखों स्टूडेंट्स के एग्जाम्स रद्द

 श्रीलंका में लाखों स्टूडेंट्स का भविष्य खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। यहां के एजुकेशनल बोर्ड के पास कागज और स्याही खत्म हो गई है। लिहाजा, क्वैश्चन पेपर्स प्रिंट नहीं कराए जा सकते। कागज और स्याही इम्पोर्ट करने के लिए हजारों डॉलर्स चाहिए और सरकार का खजाना बिल्कुल खाली होने के कगार पर है। यही वजह कि एग्जाम ही रद्द कर दिए गए हैं।

हालांकि, सरकार का कहना है कि उसने परीक्षाएं अगले आदेश तक टाली हैं, लेकिन फॉरेन करंसी जल्द मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, लिहाजा एग्जाम कंडक्ट कराना भी मुश्किल है।

सोमवार से शुरू होने थे एग्जाम
एजुकेशन अथॉरिटीज का कहना है कि शेड्यूल के मुताबिक एग्जाम सोमवार से शुरू होने थे। 1949 में श्रीलंका आजाद हुआ था और उसके बाद यह पहला मौका है कि देश में कोई परीक्षाएं रद्द की गई हैं।

प्रिंसीपल्स के नाम जारी एजुकेशन डिपार्टमेंट के ऑर्डर में कहा गया है- हमारे पास फॉरेन करंसी मौजूद नहीं है। लिहाजा, प्रिटिंग पेपर्स और इंक इम्पोर्ट नहीं किए जा सकते। इसलिए टर्म टेस्ट्स अगले आदेश तक टाले जा रहे हैं। इससे 45 लाख स्टूडेंट्स एग्जाम नहीं दे सकेंगे। इसी एग्जाम से यह तय होना था कि कि बच्चे अगली कक्षा में जाएंगे या नहीं।

IMF से उम्मीद
श्रीलंका सरकार ने IMF से बेलआउट पैकेज मांगा है। प्रेसिडेंट गोटबाया राजपक्षे का कहना है कि देश पर कर्ज बेहद ज्यादा हो चुका है और अगर IMF ने मदद नहीं की तो आने वाले दिनों में फूड आयटम्स और दवाओं का इम्पोर्ट भी मुश्किल हो जाएगा। इसी हफ्ते श्रीलंका के वित्त मंत्री भारत दौरे पर आए थे और भारत ने उन्हें एक अरब डॉलर की मदद का भरोसा दिलाया था।


दिवालिया होने का खतरा
चीन के कर्ज में डूबे श्रीलंका की इकोनॉमी बेहद बुरे दौर से गुजर रही है। महंगाई इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि लोग खाने-पीने का सामान खरीदने के लिए जूझ रहे हैं। कोरोना महामारी के कारण खजाना लगातार खाली हो रहा है। फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व 10 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। ऐसे में लोन चुकाना श्रीलंका के लिए मुश्किल हो गया है और वह साल 2022 में दिवालिया हो सकता है।


चीन के कर्ज में डूबा श्रीलंका
देश को अगले 12 महीनों में 7.3 अरब डॉलर (करीब 54,000 करोड़ भारतीय रुपए) का घरेलू और विदेशी कर्ज चुकाना है। कुल कर्ज का लगभग 68% हिस्सा चीन का है। उसे चीन को 5 अरब डॉलर (करीब 37 हजार करोड़ रुपए) चुकाने हैं। पिछले साल उसने गंभीर वित्तीय संकट से निपटने में मदद के लिए चीन से अतिरिक्त 1 अरब डॉलर (करीब 7 हजार करोड़) का लोन लिया था, जिसका भुगतान किस्तों में किया जा रहा है।

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